Badal – a call for change
July 18th, 2010 admin
बदल
भीडों के धक्कों में खुश रहने वाले,
तमाशों के रंगों को सच कहने वाले,
औरों की बातों को अपना बता कर,
चुराये खयालात अकड से जता कर,
जो डरते हैं पर डर जताते नहीं हैं,
शर्मिन्दा हैं, सर झुकाते नहीं हैं ।
न जाने के उनमे वो खुद ही कहां हैं ।
ढूंढें तो औरों कि परछाइयां हैं ।
जो खुद से, खुदी से, खुदा से ख़फा हैं,
बेखबर, बेहुनर, बेकस, बेवफा हैं ।
बदल दो ये मक्सद, ये मंज़र, ये मंज़िल ।
कफस से कदम पर कफन ही कज़ा है ।
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